आप अगले मौसम की विवाह-तिथियाँ तीन वेबसाइटों पर देखते हैं, पंडित जी से भी पूछते हैं, और हाथ में चार सूचियाँ आती हैं जो कुछ दिनों पर मेल खाती हैं और कुछ पर नहीं। स्वाभाविक है कि मन में सवाल उठे: ग़लत कौन है? आम तौर पर कोई नहीं। सूचियाँ अलग नियमों से, अलग कैलेंडर से या अलग शहर के लिए बनी होती हैं। हाँ, कभी-कभी किसी सूची में सीधी ग़लती भी होती है।
ये नौ कारण हैं जो हमें सबसे ज़्यादा दिखते हैं — मोटे तौर पर उस क्रम में कि वे कितने दिन खिसकाते हैं।
1. सिंहस्थ गुरु: ग्रंथों का कड़ा मत या छपा पंचांग
जब गुरु सिंह राशि में होते हैं, मुहूर्त चिंतामणि और धर्मसिंधु विवाह और दूसरे बड़े संस्कार रोकते हैं — गुरु जब तक सिंह के पहले 16°40′ में हैं तब तक हर क्षेत्र में, और कुछ क्षेत्रों में पूरी सिंह राशि में। कई लोकप्रिय छपे पंचांग यह नियम नहीं लगाते। गुरु 31 अक्टूबर 2026 को सिंह में आते हैं, इसलिए नवंबर 2026 से जनवरी 2027 तक कड़ा मत मानने वाले पंडित की सूची ख़ाली है, जबकि छपा पंचांग 21 नवंबर से तारीख़ें दिखाता है। तारीख़ें और क्षेत्रीय पाठ सिंहस्थ गुरु 2026–27 में हैं।
2. अस्त: अंशों से या आँखों से
शुक्र या गुरु के अस्त रहते — यानी जब वे सूर्य के इतने पास हों कि दिखाई न दें — विवाह नहीं होते। "इतना पास" पंचांग दो तरह से तय करते हैं। कुछ सूर्य सिद्धांत परंपरा के अंशों वाला नियम लगाते हैं: शुक्र के लिए 10°, वक्री हों तो 8°; गुरु के लिए 11°। दूसरे वे दिन लेते हैं जब ग्रह सचमुच भोर या साँझ में दिखाई नहीं देता। दोनों में आम तौर पर हर सिरे पर कुछ दिनों का अंतर रहता है, और कभी-कभी दो हफ़्ते या उससे भी ज़्यादा का।
इसके ऊपर ग्रंथ अस्त के आसपास "बाल्य" और "वृद्ध" दिन जोड़ते हैं — ग्रह के फिर दिखने के ठीक बाद के और अस्त होने से ठीक पहले के दिन। कितने दिन, यह क्षेत्र और आचार्य पर निर्भर है: आम तौर पर तीन से दस तक। इसलिए एक सूची में मुहूर्त दूसरी से एक हफ़्ता पहले शुरू हो सकते हैं।
जनवरी 2026 की कुछ सूचियों में विवाह की तारीख़ें थीं, जबकि शास्त्रीय अंश-नियम से शुक्र उस समय अस्त थे — नवंबर 2025 के आख़िर से फ़रवरी 2026 के मध्य तक वे सूर्य से 10° के भीतर थे। आगे के अस्त: शुक्र 19 से 29 अक्टूबर 2026 तक और 6 जुलाई से 17 सितंबर 2027 तक; गुरु 16 अगस्त से 15 सितंबर 2027 तक।
3. मास सूर्य से या चंद्रमा से
मुहूर्त चिंतामणि विवाह के महीने सूर्य की राशि से गिनाता है: सूर्य मेष, वृषभ, मिथुन, वृश्चिक, मकर या कुंभ में हों। नारद चंद्र मास बताते हैं — माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ उत्तम, कार्तिक और मार्गशीर्ष मध्यम। कुछ आचार्य वह दिन श्रेष्ठ मानते हैं जिस दिन दोनों मेल खाएँ। एक नियम मानने वाले पंचांग में विवाह का मौसम दूसरे नियम वाले पंचांग से अलग दिनों पर शुरू और ख़त्म होगा। खरमास इसी सौर नियम का लोक-रूप है; उसकी तारीख़ें खरमास 2026–27 में हैं।
4. अमांत या पूर्णिमांत
उत्तर भारत हर चंद्र मास को पूर्णिमा पर समाप्त मानता है (पूर्णिमांत); गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना अमावस्या पर (अमांत)। शुक्ल पक्ष का नाम दोनों पद्धतियों में एक ही है, पर कृष्ण पक्ष अलग-अलग महीनों के नाम से जाना जाता है — दीवाली की अमावस्या एक पद्धति में कार्तिक अमावस्या है और दूसरी में आश्विन अमावस्या। जो नियम चंद्र मास के नाम से लिखे गए हैं, जैसे नए घर में प्रवेश के महीने, वे इसलिए अलग-अलग दिनों पर पड़ सकते हैं।
5. क्षेत्रीय परंपराएँ
कई क्षेत्र अपने महीने जोड़ते हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में चंद्र मास आषाढ़ आम तौर पर विवाह के लिए टाला जाता है। बहुत-से तमिल परिवार आडि और मार्गझी टालते हैं, और केरल में कर्किडकम टाला जाता है। गुजरात खरमास को कमुरता कहता है। होलाष्टक — होलिका से पहले के आठ दिन — को मुहूर्त चिंतामणि ब्यास, रावी और सतलुज के क्षेत्र और पुष्कर तक सीमित करता है, पर आज उत्तर भारत में यह इससे कहीं ज़्यादा जगह माना जाता है। एक क्षेत्र के लिए बनी सूची दूसरे क्षेत्र पर ठीक नहीं बैठती।
6. पंचांग का गणित
हर पंचांग एक ही तरह से नहीं गिना जाता। तमिलनाडु में वाक्य पंचांगम पारंपरिक सारणियों से चलते हैं और तिरुक्कणित पंचांगम आधुनिक खगोल-गणित से; इनके नक्षत्र और तिथि के समय घंटों तक अलग हो सकते हैं। बंगाल में पारंपरिक गुप्त प्रेस पंजिका और विशुद्ध सिद्धांत पंजिका में भी ऐसा ही अंतर है। नक्षत्र कुछ घंटे पहले या बाद में ख़त्म हो, तो किसी दिन का विवाह-समय बन भी सकता है और मिट भी सकता है।
ProxaAI आधुनिक खगोल-गणित (Swiss Ephemeris) से गणना करता है — वही दृष्टिकोण जो तिरुक्कणित और विशुद्ध सिद्धांत पंचांगों और भारत सरकार के राष्ट्रीय पंचांग का है। जो परिवार वाक्य पंचांगम या गुप्त प्रेस पंजिका मानते हैं, उन्हें कुछ समयों में अंतर दिखेगा।